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छठ(Chhath) पर्व पर निबंध

 

हमारे देश भारतवर्ष में अति प्राचीन काल से धार्मिक अनुष्ठानों की परंपरा रही है जो आज भी अविरल गति से चल रही है। व्रत, पर्व, त्योहार, पूजा-पाठ आदि धार्मिक कृत्य होते रहते हैं। इन्हीं धार्मिक परंपराओं में पष्ठी व्रत भी एक महान व्रत के रूप में मनाया जाता है। पष्ठी व्रत को लोकभाषा में छठ व्रत या छठ पर्व भी कहते हैं। वर्ष में दो बार छठ मनाया जाता है एक बार चैत माह में दूसरी बार कार्तिक माह में।

छठ व्रत का अन्य पर्यो एवं व्रतों से अधिक महात्मय है। इस पर्व को हिंदू जाति बहुत ही पवित्रता एवं नियम से पालन करती है। इस व्रत को मनाने वाले व्रती बहुत ही कष्टमय साधना करते हैं। अन्य व्रतों की तुलना में छठ पर्व चार दिनों का होता है।

प्रथम दिन का प्रारंभ ‘नहाय-खाय’ से होता है। इस दिन छठ मनाने वाले परिवार में अरबा चावल और चने की दाल बनती है। लौकी की सब्जी का बनना परम आवश्यक है।

दूसरे दिन को खरना कहते हैं। इस दिन दिनभर व्रती उपवास में रहते हैं। संध्या समय गुड़ की खीर बनाई जाती और रोटियाँ बनाई जाती हैं। व्रती इन्हें प्रसाद के रूप में छठ मइया को चढ़ाते है और प्रसाद ग्रहण करते हैं। व्रती के प्रसाद ग्रहण करने के उपरांत परिवार के सभी सदस्य तथा अन्य आगंतुकगण प्रसाद ग्रहण करते हैं।

तीसरे दिन व्रती बिना जल और अन्न के उपवास में रहते हैं। घर के लोग सूर्य भगवान की पूजा करने के लिए पकवान बनाते हैं। संध्या होते ही सूर्य की अंतिम किरण के पहले टोकरी या पीतल के बर्तन में पकवान एवं फलों को रखकर जल में खड़े होकर सूर्य को अर्ध्य चढ़ाते है। यह विधि भी अन्य व्रतों से भिन्न है। उस समय नदी में व्रती अपने दोनों हाथों में पकवानों या फलों से भरी टोकरी या थाली लेकर पाँच बार घूमते हैं। यह एक प्रकार से निष्ठापूर्वक सूर्य की पूजा करते हैं।

इसके दूसरे दिन अर्थात् अंतिम दिन प्रातःकाल भी इसी विधि से सूर्य की पूजा व्रतधारी करते हैं। डूबते हुए सूर्य की आराधना करने के बाद अंतिम दिन सूर्योदय के पूर्व अर्थात् उषाकाल में उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं। छठ पर्व की यह चतुर्दिवसीय व्रत की समाप्ति होती है। सूर्य की इस पूजा और उपासना को घाट पर उपस्थित सभी लोग अति भक्तिभाव से देखते हैं। उस समय के धार्मिक वातावरण को देखकर सभी का हृदय एवं मन धार्मिक हो जाता है।

छठ पर्व वस्तुतः एक पवित्र पर्व है। इस पर्व में लोग पटाखे भी छोड़ने लग गए है जिससे इस पर्व की शालीनता और धार्मिकता कम जाती है। क्योंकि छठ व्रत है न कि त्योहार लोग छठ को भी अब त्योहार की तरह मनाने लगे हैं जो उचित नहीं।

छठ पर्व वस्तुतः बिहार में ही मनाया जाता है। बिहार के पश्चिमी गंगा तट के क्षेत्रों में लोग इसे मनाते हैं। यह अखिल भारतीय पर्व नहीं है। किंतु जिस-जिस राज्य में बिहारी लोग निवास करते हैं, वहाँ भी छठ पर्व का आयोजन होने लगा है। अन्य राज्य के लोग भी इस पर्व के प्रति अपनी धार्मिकता व्यक्त करने लग गए है।

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